भव्यता और दिव्यता का उत्सव है गणगौर। यह सौभाग्य को बढ़ाने का वचन देने वाला अनुष्ठान है। वसंत की सुगंधी बयार के बीच ढफ की थाप के साथ होली का हुडदंग समाप्त ही नहीं हुआ कि माता गणगौर की पूजा के गीतों की मधुर ध्वनि कानोें में गूंजने लगती है। नन्हीं कन्याओं से लेकर युवतियां और सौभाग्यवती नारियां अलभोर जल्दी उठकर हरी-हरी दूब तोडती बगीचों में आपको दिख जाएगी। रंग-बिरंगी चुनरियों में सजी-धजी सुहागिनें पूजा के थाल में कुंकुम, गंध, अक्षत, पुष्प और काजल-मेहंदी लेकर गणगौर को रिझाने-पूजने चली है। कहीं-कहीं तो नवविवाहित युवतियों की गणगौर पूजन में एकाग्रता इतनी बढ गई है कि अपने नवल पिया को भूल उनका मन निशदिन माता गणगौर में ही लगा रहता है। भगवती के अलौकिक सौंदर्य का अवतरण धरती पर गणगौर को पूजती नारियों में अपने-आप उतर आता है। आकाश की गणगौर पृथ्वी पर कन्याओं में स्वतः विराजमान इसीलिए हो जाती है क्योंकि कन्या से पवित्र धरती पर और कुछ नहीं है।
गणगौर पूजा न केवल लोकायत परंपरा से चला आ रहा एक अनुष्ठान या उत्सव मात्र है, यह तो शोभा, गरिमा, पवित्रता और असंख्य भाव पुष्पों से लदा अनूठा त्योहार है। गणगौर माता पार्वती को पूजने का दिन हैं। गण अर्थात भगवान महादेव और गौरी है माता पार्वती का एक नाम। महादेव को ईश्वर (ईसर) के रूप में सौभाग्यदात्री माता गौरी के साथ पूजा जाता है। श्री, सुख, शोभा, सौभाग्य, शांति, पवित्रता, प्रातः सूर्योदय की उदार किरणें तथा देवताओं की कविता जैसी अरुण उषा एवं नववधू की प्रीति और सौभाग्य-सुखी दाम्पत्य आदि सारे तथ्यों से जुडी जो माता पार्वती है, वही है गणगौर।
चैत्र के महीने के काले पखवाड़े की प्रतिपदा से लेकर शुक्ल पक्ष की तीज तक माता पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। तप-साधना के अंतिम दिन महादेव ने माता पार्वती को दर्शन दिए। बस, तब से आज तक इन सोलह दिनों में शिव-पार्वती को गणगौर के रूप में पूजने की मान्यता है। इन सोलह दिनों में माता पार्वती षोडश मातृकाओं के भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होकर श्रद्धा और प्रेम से की गई पूजा को स्वीकार करती हैं। गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, माता, लोकमाता, धृति, पुष्टि, तुष्टि और कुलदेवी के सोलह रूपों वाली गणगौर को चैत्रीय नवरात्र के तीसरे दिन विशेष रूप से पूजा जाता है। ज्योतिष के अनुसार तृतीया तिथि की अधिष्ठात्री देवी गौरी ही है। अतः तृतीया तिथि माता पार्वती की प्रिय तिथि है। रामायण की यह कथा प्रसिद्ध है कि जनकदुलारी माता जानकी ने इसी तृतीया तिथि यानी गणगौर को भगवती गौरी की पूजा-स्तुति की थी-
जय जय गिरिवर राजकिसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी।।
माता गौरी की पूजा से जानकी को मिला सुफल आशीर्वाद ही था कि आज भी संसार में दाम्पत्य जीवन का सबसे बड़ा आदर्श राम-सीता की अनुपमेय जोड़ी ही है। जहां राम केवल सीता के लिए तथा सीता सिर्फ राम के लिए है।
गणगौर स्त्री-पुरुष के आपसी संबंधों में पवित्रता की याद दिलाने वाला पर्व है। यह समाज की व्यवस्था में नर-नारी के ’संबंध’ की पवित्रता पर जोर देने का उत्सव है। कहीं पांव न फिसले और न ही चरित्र गिरे। नर और नारी एक-दूसरे के लिए मांस से ज्यादा नहीं वाली संस्कृति को नकारकर सदाचारी और पवित्र बने रहने के लिए गणगौर सबसे प्रासंगिक पर्व है। विशेषतः आज के दौर में तब, जब गर्भपात कानूनी है। गोलियां, दवाएं और निरोध किराने की दुकानों पर भी प्राप्य हैं। ऐसे हालात में अनियंत्रित परकीय-प्रेम के बजाय आत्मानुशासित स्वकीय-प्रेम को सहेजने का सबसे बड़ा अनुष्ठान गणगौर है। यह पर्व मृत्युंजय शिव और मंगलकारिणी गौरी के अमर दाम्पत्य आनंद का प्रतीक है, जहां वे दो होकर भी एक हैं। एक-दूसरे के लिए हैं। सच्चे हैं और दाम्पत्य के गहरे प्रतीक हैं। गणगौर आज के बदलते दौर के दाम्पत्य में शिव-पार्वती के अखंड और अविच्छेद दाम्पत्य की कथा सुनाने वाला पर्व है, जहां आपसी अविश्वास और अश्रद्धा के लिए कोई जगह नहीं है।
प्रातः सुमंगल वेला में गणगौर पूजन करने जाती कुमारियां और सौभाग्यवती स्त्रियां माता गणगौर के सुमधुर गीत गाती हैं- खोल ए गणगौर माता, खोल ए किवाड़ी। बारै ऊभी थाने पूजन हाली।। आवाहन के बाद माटी के बने ईसर-गणगौर को पूजकर स्त्रियां समवेत स्वरों में मधुर कंठ से एक लय में गाती है-
गौर गौर गणपति ईसर पूजे पार्वती,
पार्वती का आला गीला गौर का सोना का टीका...।।
इस लंबे लोकगीत के सोलह बार गान के बाद ढेरों लोकगीतों से गणगौर को प्रसन्न कर वर प्राप्ति की साधना संपन्न होती है। क्षत्रिय महिलाओं के लिए गणगौर विशेष उत्सव है -
पूजण द्यो गणगौर, भंवर म्हानै पूजण द्यो गणगौर।
एजी म्हांकी सहेल्यां पूजै छै गणगौर।।
शुरू से लेकर अंत तक पूरे सोलह दिनों होली की भस्म से बनाए पिंडों में शिव-पार्वती की छवि का ध्यान। अंतिम दिन उग आए जौ के अंकुरों से माता गणगौर का विशिष्ट पूजन तो अतुल्य व अनुपम होती ही है। न धन की कोई जरूरत और न ही कोई बाहरी दिखावा। बस, माता गणगौर से अखंड सौभाग्य के वरदान की उत्कट लालसा कि हे माता गौरी, सुहाग को अभय कर दे, उसे अमर कर दे।
गणगौर पर्व पर गणगौर की सवारी का निकलना इस त्योहार के उल्लास में कई गुना बढ़ोतरी कर देता है। राजस्थान से विभिन्न राजपरिवारों में आज भी गणगौर की मनमोहक सवारी निकाली जाती है। अनेक कवियों ने इस सवारी का ऐसा सुंदर वर्णन किया है जिससे इस त्योहार की प्राचीनता और सुदृढ आध्यात्मिकता प्रकट होती है।
पिछली शताब्दी में जयपुर में हुए संस्कृत कवि भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने ‘जयपुरवैभवम्’ ग्रंथ में गणगौर की सवारी का जो मनोहारी वर्णन किया, वह इस अनोखे श्लोक में निबद्ध है-
आंगन अटारी छात छज्जे चित्रसारी चढी चंद्रमुखवारी पुरनारी चहुं ओर की
मजमा जमा है सारी रंगतों का देखो जरा गोया गुलक्यारी किसी बागे पुरजोर की।
‘मंजुनाथ’सरसवसंतात्सुखसारीभवन् फुल्लत्पुष्यधारी स हि कामतरुः कोरकी
भायाजी! भरी छै भीड भारी, ईं तबारी होर बारी खोल देखो या सवारी गणगौर की।।
एक ही श्लोक में ब्रज, उर्दू, संस्कृत व ढंूढाडी भाषा के सम्मिलन का यह अनूठा प्रयोग गणगौर माता की सवारी के वर्णन का मिलता है। गणगौर हमारे लोकजीवन का तो सर्वश्रेष्ठ उत्सव है ही, हमारी अमर परंपरा को प्रकट करने में भी इसकी कोई बराबरी नहीं है।
शास्त्री कोसलेन्द्रदास
सहायक आचार्य-दर्शन शास्त्र
राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर
मो. 9214316999
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