नवरात्र यानी पूरे नौ दिनों तक घर-आंगन में आनंद बांटती कन्यारूपिणी शक्ति का पूजन-अर्चन-वंदन। कंुवारी कन्याओं के नाम के आगे 'कुमारी' और विवाहित महिलाओं के नाम में 'देवी' शब्द जोड़कर हमारी वैदिक संस्कृति ने स्पष्ट किया था कि प्रत्येक नारी देदीप्यमान ज्योतिर्मय सत्ता है। तभी तो अष्टमी और नवमी को घर-घर में देवी की पूजा सिर्फ कन्या के रूप में होती है। वह देवी ही हमें मां के रूप में जन्म देती है। पत्नी के रूप में सुख और पुत्री बनकर आनंद का प्रसाद बांटती है।
धरती पर जब देवी स्वरूप धारण कर उतरती है, तो वह प्रकृति में सबसे निराला, कोमल तथा बेजोड़ स्वरूप होता है। चरणों में कुंकुम लगाए और नूपुर झंकार की मधुर ध्वनि सुनाती देवी का धरती पर साक्षात अवतरण है-नारी। स्त्री में तेज और दीप्ति की प्रमुखता है। इसी से हमारे यहां नारी के नाम में 'देवी' शब्द जोड़ा जाता है। आजकल नई पीढ़ी की महिलाएं अपने नाम के आगे 'देवी' शब्द लगाना भले ही पसंद न करती हो, पर है यह बड़ा ही अर्थ-गंभीर और महिमामय शब्द। देवी स्वयं कहती है कि 'पृथ्वी पर सारी çस्त्रयों में जो भी सौभाग्य, सौंदर्य है, वो पूरी तरह से मेरा ही है।' तभी तो अष्टमी और नवमी को हम कन्याओं के पग पखारते हैं, उन्हें दक्षिणा देते हैं, लेकि नवही लक्ष्मी और सरस्वती-स्वरूपिणी कन्या जब हमारे घर कोख में उतरती है तो अवतार लेने से पहले हम उसे नष्ट कर डालते हैं! क्या यही है दुर्गा पूजा और हमारी श्रद्धा का सत्य?
शक्ति एक, रूप अनेक
हमें मानना होगा देवी किसी पत्थर की मूर्ति में नहीं, वह तो केवल नारी में विराजमान है। वह देवी ही हमारेे घर में मां, पत्नी और बेटी के रूप में मौजूद है। हम घर में इन स्वरूपों का आदर करें और उनसे सच्चरित्र तथा शक्ति का आशीर्वाद मांगें। शरत्काल के पवित्र आश्विन मास में शुभ्र चांदनी को फैलाते शुक्ल पक्ष में घर-घर में 'दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोùस्तुते' की शास्त्रीय ध्वनि सुनाई देने लगी है।
ये मंत्र वे हैं, जिन्हें शताब्दियों से हमारी संस्कृति में भगवती से वर प्राप्ति के लिए जपा जाता है। दुर्गा पूजा, शारदीय नवरात्र और महाशक्तिअनुष्ठान-तीन नाम पर त्योहार एक। नवरात्र अर्थात जौ में उग आए नन्हे-नन्हे अंकुरों तथा नौ दिनों तक घर-आंगन में आनंद प्रसाद बांटती कन्यारूपिणी शक्ति का पूजन-अर्चन-वंदन। नवरात्र वर्ष में चार बार आते हैं। दो बार प्रत्यक्ष और दो बार गु# रूप में, लेकिन इनमें प्रत्यक्ष रूप में आने वाले शारदीय नवरात्र सबसे ज्यादा प्रशस्त हैं। दुर्गास#शती में देवी स्वयं कहती हैं कि 'शारदीय नवरात्र में जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति सहित मेरी पूजा करेगा, वह सभी बाधाओं से मुक्तहोकर धन, धान्य और संतान को प्राप्त करेगा।'
संस्कृति का पर्व
नवरात्र जैसा सांस्कृतिक पर्व साधना और संयम के मनोभावों को प्रकट करने का पर्व-काल है। इन्हीं नौ दिनों में भगवान श्रीराम ने अत्याचारी रावण को मारने के लिए किष्किंधा में प्रवर्षण पर्वत पर 'शक्ति पूजा' की थी। अधर्म के थपेड़े खा रहे पांडवों को महाभारत के धर्म युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने इन्हीं नौ दिनों में 'देवी पूजा' करने का उपदेश दिया था। धर्मिक इतिहास की ओर नजर डालें तो नवरात्र का उल्लेख वैदिक काल से है। इसी कारण घर-घर में दुर्गा-पूजा उत्सव की तरह मनाई जाती है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर लय हो जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, पर देवी की असली प्रतिमा तो 'घट' है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दाईं ओर नव-यवांकुर (जौ के अंकुर) और सामने हवनकुंड! नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र और गंध आदि से षोडशोपचार पूजन। नैवेद्य में पतासे और नारियल तथा खीर। पूजन तथा हवन के बाद 'दुर्गासप्तशती' का पाठ।
सृष्टि की जननी
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना तथा जीवन शक्ति संसार में जहां कहीं भी दिखाई देती है, वहां देवी का ही दर्शन होता है। ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वस्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। देवीभागवत में लिखा है कि देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। देवी सारी सृष्टि को उत्पन्न तथा नाश करने वाली परम शक्ति है। देवी ही पुण्यात्माओं की समृद्धि और पापाचारियों की दरिद्रता है। जगन्माता दुर्गा सुकृति मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में दुर्बुद्धिरूपी अलक्ष्मी, विद्वानों के ह्वदय में बुद्धि और विद्या, सज्जनों में श्रद्धा और भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा तथा मर्यादा के रूप में निवास करती है। माकंüडेय पुराण कहता है कि 'हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। संसाररूपी महासागर को पार कराने वाली नौका तुम हो। भगवान विष्णु के ह्वदय में निरंतर निवास करने वाली माता लक्ष्मी तथा शशिशेखर भगवान शंकर की महिमा बढ़ाने वाली माता गौरी भी तुम ही हो।'
नारी में नवदुर्गा
कूर्मपुराण में धरती की स्त्री का पूरा जीवन आकाश में रहने वाली नवदुर्गा की मूर्ति मे स्पष्ट रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या 'शैलपुत्री', कौमार्य अवस्था तक 'ब्रह्मचारिणी' तथा विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल और पवित्र होने से 'चंद्रघंटा' कहलाती है। नए जीव को जन्म देने हेतु गर्भधारण करने से 'कूष्मांडा' और संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री 'स्कंदमाता' के रूप में होती है। संयम और साधना को धारण करने वाली स्त्री 'कात्यायनी' और पतिव्रता होने के कारण अपनी और पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से 'कालरात्रि' कहलाती है। कालीपुराण के अनुसार सारे संसार का उपकार करने से 'महागौरी' तथा धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले पूरे परिवार और सारे संसार को सिद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद देती नारी 'सिद्धिदात्री' के रूप में जानी जाती है।
शास्त्री कोसलेंद्रदास
धरती पर जब देवी स्वरूप धारण कर उतरती है, तो वह प्रकृति में सबसे निराला, कोमल तथा बेजोड़ स्वरूप होता है। चरणों में कुंकुम लगाए और नूपुर झंकार की मधुर ध्वनि सुनाती देवी का धरती पर साक्षात अवतरण है-नारी। स्त्री में तेज और दीप्ति की प्रमुखता है। इसी से हमारे यहां नारी के नाम में 'देवी' शब्द जोड़ा जाता है। आजकल नई पीढ़ी की महिलाएं अपने नाम के आगे 'देवी' शब्द लगाना भले ही पसंद न करती हो, पर है यह बड़ा ही अर्थ-गंभीर और महिमामय शब्द। देवी स्वयं कहती है कि 'पृथ्वी पर सारी çस्त्रयों में जो भी सौभाग्य, सौंदर्य है, वो पूरी तरह से मेरा ही है।' तभी तो अष्टमी और नवमी को हम कन्याओं के पग पखारते हैं, उन्हें दक्षिणा देते हैं, लेकि नवही लक्ष्मी और सरस्वती-स्वरूपिणी कन्या जब हमारे घर कोख में उतरती है तो अवतार लेने से पहले हम उसे नष्ट कर डालते हैं! क्या यही है दुर्गा पूजा और हमारी श्रद्धा का सत्य?
शक्ति एक, रूप अनेक
हमें मानना होगा देवी किसी पत्थर की मूर्ति में नहीं, वह तो केवल नारी में विराजमान है। वह देवी ही हमारेे घर में मां, पत्नी और बेटी के रूप में मौजूद है। हम घर में इन स्वरूपों का आदर करें और उनसे सच्चरित्र तथा शक्ति का आशीर्वाद मांगें। शरत्काल के पवित्र आश्विन मास में शुभ्र चांदनी को फैलाते शुक्ल पक्ष में घर-घर में 'दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोùस्तुते' की शास्त्रीय ध्वनि सुनाई देने लगी है।
ये मंत्र वे हैं, जिन्हें शताब्दियों से हमारी संस्कृति में भगवती से वर प्राप्ति के लिए जपा जाता है। दुर्गा पूजा, शारदीय नवरात्र और महाशक्तिअनुष्ठान-तीन नाम पर त्योहार एक। नवरात्र अर्थात जौ में उग आए नन्हे-नन्हे अंकुरों तथा नौ दिनों तक घर-आंगन में आनंद प्रसाद बांटती कन्यारूपिणी शक्ति का पूजन-अर्चन-वंदन। नवरात्र वर्ष में चार बार आते हैं। दो बार प्रत्यक्ष और दो बार गु# रूप में, लेकिन इनमें प्रत्यक्ष रूप में आने वाले शारदीय नवरात्र सबसे ज्यादा प्रशस्त हैं। दुर्गास#शती में देवी स्वयं कहती हैं कि 'शारदीय नवरात्र में जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति सहित मेरी पूजा करेगा, वह सभी बाधाओं से मुक्तहोकर धन, धान्य और संतान को प्राप्त करेगा।'
संस्कृति का पर्व
नवरात्र जैसा सांस्कृतिक पर्व साधना और संयम के मनोभावों को प्रकट करने का पर्व-काल है। इन्हीं नौ दिनों में भगवान श्रीराम ने अत्याचारी रावण को मारने के लिए किष्किंधा में प्रवर्षण पर्वत पर 'शक्ति पूजा' की थी। अधर्म के थपेड़े खा रहे पांडवों को महाभारत के धर्म युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने इन्हीं नौ दिनों में 'देवी पूजा' करने का उपदेश दिया था। धर्मिक इतिहास की ओर नजर डालें तो नवरात्र का उल्लेख वैदिक काल से है। इसी कारण घर-घर में दुर्गा-पूजा उत्सव की तरह मनाई जाती है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर लय हो जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, पर देवी की असली प्रतिमा तो 'घट' है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दाईं ओर नव-यवांकुर (जौ के अंकुर) और सामने हवनकुंड! नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र और गंध आदि से षोडशोपचार पूजन। नैवेद्य में पतासे और नारियल तथा खीर। पूजन तथा हवन के बाद 'दुर्गासप्तशती' का पाठ।
सृष्टि की जननी
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना तथा जीवन शक्ति संसार में जहां कहीं भी दिखाई देती है, वहां देवी का ही दर्शन होता है। ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वस्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। देवीभागवत में लिखा है कि देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। देवी सारी सृष्टि को उत्पन्न तथा नाश करने वाली परम शक्ति है। देवी ही पुण्यात्माओं की समृद्धि और पापाचारियों की दरिद्रता है। जगन्माता दुर्गा सुकृति मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में दुर्बुद्धिरूपी अलक्ष्मी, विद्वानों के ह्वदय में बुद्धि और विद्या, सज्जनों में श्रद्धा और भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा तथा मर्यादा के रूप में निवास करती है। माकंüडेय पुराण कहता है कि 'हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। संसाररूपी महासागर को पार कराने वाली नौका तुम हो। भगवान विष्णु के ह्वदय में निरंतर निवास करने वाली माता लक्ष्मी तथा शशिशेखर भगवान शंकर की महिमा बढ़ाने वाली माता गौरी भी तुम ही हो।'
नारी में नवदुर्गा
कूर्मपुराण में धरती की स्त्री का पूरा जीवन आकाश में रहने वाली नवदुर्गा की मूर्ति मे स्पष्ट रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या 'शैलपुत्री', कौमार्य अवस्था तक 'ब्रह्मचारिणी' तथा विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल और पवित्र होने से 'चंद्रघंटा' कहलाती है। नए जीव को जन्म देने हेतु गर्भधारण करने से 'कूष्मांडा' और संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री 'स्कंदमाता' के रूप में होती है। संयम और साधना को धारण करने वाली स्त्री 'कात्यायनी' और पतिव्रता होने के कारण अपनी और पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से 'कालरात्रि' कहलाती है। कालीपुराण के अनुसार सारे संसार का उपकार करने से 'महागौरी' तथा धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले पूरे परिवार और सारे संसार को सिद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद देती नारी 'सिद्धिदात्री' के रूप में जानी जाती है।
शास्त्री कोसलेंद्रदास
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