Saturday, June 16, 2018

ईद के बहाने चलाई जा रही चित्रकारी में ज्यादा ही 'कलाकारी' हो गई है

इस पेंटिंग को ध्यान से देखिये। ईद में मौके पर यह पेंटिंग व्हाट्सअप, ट्वीटर और फेसबुक पर खूब चल रही है।ट्वीटर पर स्वाति वशिष्ठ Swati Vashishth a ने इस फोटो पर लिखा है, 'राजस्थान में18वीं शताब्दी की एक लघु चित्रकला में भगवान कृष्ण रोजेदारों को चंद्रमा दिखाते हुए।' वहीँ क़तर इन्फॉर्मेशन और मार्टेटिंग के संपादक अतुल श्रीवास्तव Atul Srivastava (बलराम) ने अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा है, 'पेंटिंग सुबह से व्हाट्सअप और फेसबुक पर चल रही इसलिए इसके बारे में कुछ बताये बिना साझी संस्कृति, साझी विरासत वाले हिंदुस्तान के लोगों को ईद की मुबारकबाद !! आप माने या न माने असली भारत आज भी यही है!'
साझी संस्कृति और साझी विरासत वाले हिंदुस्तान की बात करने वाले अत्युत्साही लोग इसे खुले दिमाग की पेंटिंग बता रहे हैं और साझा कर रहे हैं। शायद वे यह बताना चाह रहे हैं कि हमारी पुरातन उदारता अब संकीर्णता में बदल गई है। समाप्ति की ओर बढ़ रही है। पर क्या बात सही नहीं है कि इस चित्रकारी में कुछ ज्यादा ही 'कलाकारी' हो गई। यह अच्छा नहीं होता कि भगवान् कृष्ण की जगह उनसे भी पुरातन भगवान् श्रीराम को ही चाँद दिखाते बता देते? भारतीय परंपरा के सबसे बड़े नायक वेदवेद्य पुरुषोत्तम श्रीराम इस चित्र में माता सीता, गुरुविनीत लक्ष्मण और आंजनेय श्रीहनुमान के साथ होते और कह रहे होते कि 'वो देखो, चाँद निकल आया, अल्लाह आपको खूब बरकत दे, ईद मुबारक।'
यह समझ से परे है कि इतिहास और सच्चाई को इतना तोड़-मरोड़ना किसके हित में है? जो रात-दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर इतिहास को बदलने के आरोप मँढते फिर रहे हैं, वे इस इतिहास को किस 'सेकुलरिज्म' से प्रदर्शित कर रहे हैं? क्या 'करवा चौथ' जैसे पौराणिक व्रतों पर ऐसे ही चाँद दिखाते पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब का चित्र किसी को जमेगा? नहीं ना? तो फिर इस तरह का व्यर्थ चांचल्य क्यों है? मेरे कुछ मुस्लिम मित्रों ने ही आज इसे 'हास्यास्पद' और 'अतिशयोक्ति' भरा बताया। खैर, भारत उदार है। वह अपने राम और कृष्ण से ईद का 'चाँद' दिखवा देगा। वह वेदों में 'ईद' की ऋचाएं भी खोज लेगा। वहीँ सुख्यात पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी Pankaj Chaturvedi ‎( پنکج چترویدی) का फेसबुक पर कहना है कि 'त्रेता या द्वापर में इस्लाम था क्या? इस्लाम तो आधुनिक विश्व यानि ईसा के सात सौ साल बाद का धर्म है।'
फिर भी मैं इस चित्र की भी इस मायने में प्रशंसा करता हूँ कि यदि इससे भी बेहतर माहौल बने और आपसी सूझ-बूझ बढ़े तो इसे भी स्वीकार कर लेना चाहिए। पर यह स्वीकार किस मूल्य पर होगा इसका अनुसंधान जरूरी है - सीस दिए जो हरि मिले तो भी सस्ता जान।
खैर, ईद मुबारक।

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