लोकसभा में प्रवेश करते ही दीवारों पर लिखे ढेरों संस्कृत श्लोक पढ़ने को मिल जाएंगे। वेद—पुराण और रामायण—महाभारत के श्लोक सनातन परंपरा के वाहक हैं। इस बार सनातन भाषा संस्कृत की गूंज संसद में सुनाई दी। संस्कृत में शपथ लेने वाले सांसदों की संख्या में चौंकाने वाली वृद्धि हुई है। केंद्र सरकार के चार मंत्रियों समेत 44 सांसदों ने पद की शपथ संस्कृत में ली। यह आंकड़ा पिछले दो बार से ज्यादा है। 2009 में सिर्फ 10 सांसदों ने संस्कृत में शपथ ली थी, वहीं 2014 में यह आंकड़ा बढ़कर 39 हो गया। आश्चर्यजनक रूप से यह संख्या अब 44 हो गई है। मोदी सरकार में मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, श्रीपद नायक, अश्विनी कुमार चौबे और प्रतापचंद्र षडंगी ने संस्कृत में ली।
क्या इस नई शुरूआत से संस्कृत के दिन फिरेंगे? चारों ओर यह सवाल उठाया जा रहा है। इस सवाल का संबंध संस्कृत के मौजूदा हालातों से हैं। साल 2011 की जनगणना के हिसाब से मात्र 24,821 लोगों ने संस्कृत को अपनी मातृभाषा बताया है। हालांकि ये आंकड़ा भी पिछली जनगणना से बढ़ा है। साल 2001 में मात्र 14,135 लोगों ने संस्कृत को मातृभाषा बताया था। भारत में मातृभाषा के रूप में दर्ज 22 भाषाओं में संस्कृत सबसे आखिरी पायदान पर है। क्या इससे माना जा सकता है कि संस्कृत आम बोलचाल की भाषा के रूप में लोकप्रिय नहीं है?
हाल ही संसद के मौजूदा सत्र में मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ने संस्कृत की विश्वव्यापी जरूरत को बताते हुए उसकी वैज्ञानिकता को माना। पोखरियाल ने भारतीय भाषाओं के साथ संस्कृत को मजबूत करने का भी दावा किया। उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि तीन केंद्रीय संस्कृत संस्थानों में रिक्त पड़े 177 पदों को जल्द भरा जाएगा।
इंटरनल क्वालिटी एशोरेंस सेल के आंकड़ों के हिसाब से संस्कृत के शिक्षण संस्थान अच्छे दौर में नहीं हैं। केंद्रीय और राज्यों के संस्कृत विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है। शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं। शोध और लेखन की गति बहुत धीमी है। आधुनिकता से ताल मिलाने में इन संस्थानों को कई कठिनाइयां हैं। ऐसे में सांसदों द्वारा संस्कृत में शपथ लेना संस्कृत के हालातों पर प्रभावी होगा या नहीं? इसका कोई उत्तर किसी के पास नहीं है। संस्कृत में शपथ लेने वाले रामचरण बोहरा इसे संस्कृत को फैलाने और बढ़ाने का शुरूआती कदम मानते हैं। जयपुर से सांसद बोहरा का मानना है, 'इससे संसद का ध्यान संस्कृत की ओर जरूर जाएगा, जिसके दूरगामी परिणाम संस्कृत के पक्ष में होंगे। संस्कृत के दिन जरूर बहुरेंगे।'
अभी संस्कृत अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जूझ रही है। क्या संस्कृत का अस्तित्व बना रहना जरूरी है? इस सवाल का जवाब हां और ना में नहीं हो सकता। पर यह सच है कि हिंदी समेत सारी भारतीय भाषाओं के बचे और बने रहने के लिए संस्कृत जरूरी है। संविधान में लिखा है, 'राष्ट्रभाषा हिंदी की शब्दावली मुख्य रूप से संस्कृत से ली जाएगी।’ वस्तुतः जब संस्कृत का हिमालय द्रवित होता है तभी भारतीय भाषाई नदियों में पानी आता है। पर अभी खुद संस्कृत को सहारे की जरूरत है। यह सहारा समाज और सरकार, दोनों को देना होगा। उसे ऐसे आधुनिक शिक्षण केंद्र भी चाहिए, जहां अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत के अध्ययन एवं शोध का माहौल बनाया जा सके।
अजीब विरोधाभास यह भी है कि एक ओर संस्कृत संस्थान 'वेंटीलेटर' पर हैं तो दूसरी ओर संस्कृत भाषा बोलने और जानने में लोगों की अभिरुचि बढ़ भी रही है। पर संस्कृत के पठन-पाठन का क्षेत्र संकीर्ण होता जा रहा है। अर्थागम का कोई समुचित प्रबंध न होने से संस्कृत विद्यालयों में पढ़ने वालों की संख्या बराबर गिरती जा रही है। जो लोग संस्कृत के महत्त्व को समझते हैं, उनको इस ओर ध्यान देना चाहिए और केंद्रीय तथा प्रादेशिक शासनों पर दबाव डालना चाहिए कि इन बातों के लिए समुचित प्रबंध करें, नहीं तो संस्कृत कहीं मृत भाषा होकर ही न रह जाए। यदि ऐसा होता है तो इसका एक भयंकर परिणाम यह होगा कि आने वाली पीढ़ियों का अपनी संस्कृति के भंडार और उद्गम स्रोत से संबंध विच्छिन्न हो जाएगा, जो केवल भारत की ही नहीं समूचे मानव जगत की भयावह क्षति होगी। अभी संस्कृत शिक्षा में ठहराव—सा आ गया है। ये आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। जबकि समाज को इन संस्थानों से अमृत निकलने की प्रतीक्षा है।
नई शिक्षा नीति में भी संस्कृत को सहारा नहीं मिल पाया है। इसके लागू होने से संस्कृत की स्थिति में सुधार के जरा भी आसार नहीं है। पिछले पांच दशकों में त्रिभाषा सूत्र ने देश को भाषाई आधार पर विभाजित किया है। भाषाई आधार पर राज्यों का गठन देश का पहला विभाजन था तो त्रिभाषा सूत्र के आधार पर दूसरा। किसी भी भाषा से एकता और सौहार्द बढ़ना चाहिए, विभाजन और घृणा नहीं। लेकिन भाषा के आधार पर देश को बांटने की राजनीति के दृश्य आए दिन सामने आते हैं। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस स्थिति को बरसों पहले भांप लिया था। इसी कारण उन्होंने संस्कृत को राजभाषा बनाने की सिफारिश की थी। दुर्भाग्य से संस्कृत आजादी के सात दशक बाद भी नीचे के पायदान पर है, जिसके उत्थान के लिए कोई नीति नहीं है।
अभी संस्कृत उपेक्षित-सी है। इसके बारे में घोर अज्ञान है। इसकी हर शाखा तना बन चुकी है। शाखाओं ने वृक्ष का रूप ले लिया और मूल मरता चला गया। क्या अब भी संस्कृत देश को उन्नति के रास्ते पर ले चलने में समर्थ है? इसका प्रश्न का उत्तर ‘हां’ अथवा ‘ना’ में नहीं हो सकता। मौजूदा स्थिति में संस्कृत का सामाजिक रूपांतरण हो सके तो तय होगा कि संस्कृत में कितनी ऊर्जा शेष है! वह समाज को ऊर्जावान बनाने में समर्थ है। संस्कृत के उपकरण सदियों से चले आ रहे हैं। उसके प्रयोग भी हो रहे हैं। जहां-जहां प्रयोग हुए हैं, नतीजे दिखने लगे हैं। यह भी सही है कि संस्कृत को उस मकडज़ाल से उबरना होगा, जो पुरातनपंथियों ने उसके इर्द-गिर्द बुन रखा है।
शिक्षा का कोई सांप्रदायिक चरित्र नहीं होता। उसे सांप्रदायिकता के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। जब धर्मनिरपेक्षता का दावा होता है तो उस स्थिति में शिक्षा के प्रति भी धर्मनिरपेक्ष दृष्टि होनी चाहिए। इससे से पता चलेगा कि भारत की आत्मा संस्कृत है। संस्कृत का स्वरूप स्वयंसिद्ध है। उसे बताने के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं है। उसकी तुलना किसी से नहीं हो सकती। वह हिमालय जैसी विराट है। उसका साहित्य ज्ञान और विज्ञान की दुनिया है। यही कारण है कि संस्कृत पूरे विश्व में पढ़ाई जा रही है। हाल ही टोरंटो स्कूल बोर्ड ने संस्कृत कक्षाएं शुरू की है। क्या यह सही नहीं कि जिस भाषा की पोथियां नासा के वैज्ञानिक बांच रहे हो, उस भाषा को तमाम भारतीय शिक्षण संस्थानों के आधारभूत ज्ञान के रूप में होना चाहिए? बाबा सहब अंबेडकर संस्कृत के विरुद्ध ऐसी भ्रांतियों को तोड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने यह आवश्यक माना कि भारत के लोग अनिवार्य रूप से संस्कृत लिखें-पढ़ें। जब लोग संस्कृत समझेंगे तो कई विद्रूतायें टूटेंगी। आश्चर्य है कि अंबेडकर का यह सपना आज भी पूरा होने की प्रतीक्षा में है।
इस वीडियो में जयपुर शहर से चुने सांसद पण्डित श्री रामचरण बोहरा संस्कृत में शपथ ले रहे हैं।
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