आज संस्कृत दिवस है। लोक सभा तथा विधानसभा के मानसून सत्र से कई बार संस्कृत दिवस टकरा जाता है। यह संयोग ही है कि इस बार संस्कृत दिवस "माननीयों" की दृष्टि से बच गया। अन्यथा कई गुणवान श्वेत वस्त्रधारी तो यह तक पूछ लेते कि अरे! भारत में संस्कृत दिवस भी मनाया जाता है, कब? हमें तो पता ही नहीं। इतना कहकर लोकतंत्र के साधक बड़े आश्चर्य से संस्कृत वाले को देखेंगे और संस्कृत अभी तक है, इस बात पर हैरान होकर तपाक से यह भी पूछ डालेंगे कि सच्ची बताओ, संस्कृत के पास वोट कितने हैं? संस्कृत दिवस एक परम्परा है। वैदिक साहित्य में यह "श्रावणी" के नाम से लिखा गया था। संस्कृत के विद्वान इस दिन हजारों वर्षो से "यज्ञोपवीत" का पूजन कर परस्पर विद्वानों का सम्मान करते थे।
भारत में "श्रावणी" रक्षाबंधन अर्थात श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती रही है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1968 में देश के प्रख्यात भाषाविद सुनीतिकुमार की सिफारिश पर आज के दिन को "संस्कृत दिवस" मनाने के लिए निश्चित कर दिया। संस्कृत दिवस के केन्द्र में संस्कृत की स्थिति की चर्चा और संस्कृत विद्वानों का आदर-सत्कार है। जमाना बदला तो "श्रावणी" का नाम और इसे मनाने का तरीका तथा मनाने वाले भी बदल गए। आज ही के दिन संस्कृत दिवस मनाने के महžव को शायद वे लोग समझते होंगे, जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर संस्कृत के बारे में सोचते होंगे। जो केवल नौकरी या कर्मकांड के रूप में संस्कृत से जुडे हैं, उनके लिए तो संस्कृत दिवस का दिन "मजबूरी" है।
आज के दिन को छोड़कर जो संस्कृत दिवस आगे-पीछे मना रहे हैं और पुरस्कारों का लेन-देन कर रहे हैं, वे जरा पूछे अपने-आप से कि हजारों वर्षो से चली आ रही इस परम्परा को उन्होंने क्यों तोड़ा? संस्कृत को पुरस्कारों का आडंबर नहीं, बल्कि सच्चा समर्पण चाहिए! संस्कृत दिवस अब एक कर्मकांड बन कर रह गया है। आज सच्चे, आधे और झूठे मन से संस्कृत को याद किया जाता है। संस्कृत के इतिहास को दोहराया जाता है और उसे "श्रद्धांजलि" दी जाती है। यह निर्घारित है कि अधिकतर वक्ता इस दिन वही रटी-रटाई बातें कहेंगे, जिन्हें वे बोलते आ रहे हैं और उन बातों को सुनने वाला आज तक कोई नहीं मिला। संस्कृत के पंडित शासन में बैठे मंत्री और विधायकों से छिपकर सरकार को कोसते हुए वही सनातन बात करेंगे कि सरकार संस्कृत के लिए कुछ नहीं कर रही पर हम संस्कृत के लिए बहुत कुछ करना चाह रहे हैं। जरा पूछिए, इन आत्ममुग्ध महापुरूषों से कि सरकार संस्कृत का पक्ष न लेती और सत्ता का आश्रय संस्कृत को प्राप्त न होता तो क्या ये संस्कृत के नाम से पुरस्कार ग्रहण करने वाले संस्कृत को बचा कर अभी तक जिंदा रख सकते थे? संस्कृत ने इन्हें सब कुछ दिया पर ये भी तो संस्कृत को कुछ देना सीखें।
राजस्थान की सरकारों का इतिहास उठाकर देखिए, देश का पहला संस्कृत शिक्षा निदेशालय 1958 में राजस्थान में बना। जगन्नाथ पहाडिया ने 1980 में राजस्थान संस्कृत अकादमी की स्थापना की। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने 1998 में राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक विधानसभा में पास किया, जिसका परिणाम जयपुर के मदाऊ में स्थित विशाल संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में दिखाई दे रहा है। वसुंधरा राजे सरकार ने 24 वेद विद्यालय खोले। गहलोत सरकार ने राजस्थान में 300 संस्कृत प्राथमिक विद्यालय, संस्कृत शिक्षा के भरतपुर संभाग की स्थापना, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में अरसे बाद नियुक्तियां की हैं। सरकार लाखों रूपए के पुरस्कार बांट रही है।
अब सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठे संस्कृत के चतुर सुजान पंडित भी तो "कुछ" करें। संस्कृत शिक्षा मंत्री बृजकिशोर शर्मा अनेक बार इस बात को दमदार तरीके से संस्कृत के लोगों के बीच कह चुके हैं कि "संस्कृत वाले भी संस्कृत का भला करने के लिए आगे आएं।" भारत माता की संतान जब कभी अपने चमकते इतिहास की ओर देखती है, तो उसे ढेर सारे झंझावातों के बीच जो चीज शुरू से आज तक अपने साथ चली आती दिख रही है, वह है संस्कृत। संस्कृत मात्र भाषा नहीं, संस्कृत तो भारत माता के धर्मनिष्ठ वीर सपूतों से लेकर कंकड़-पत्थरों की अमर गाथा कहती वह सुरीला राग है, जो हिमालय की अपत्यकाओं से उठकर समुद्र के भीतर तक रची-बसी है। भारत की अनेक मान्यताएं भले बदल गई हों, पर यदि आज भी भारत का भारत तžव बचा हुआ है तो उसके केंद्र में संस्कृत है। सारी भारतीय भाषाएं अंग्रेजी तूफान का सामना कर रही हंैं, तो उनके पीछे शक्ति और सामथ्र्य दोनों ही संस्कृत के हैं। जो आधुनिक ज्ञानी यह समझाने में लगे हैं कि संस्कृत अब समाप्ति तक आ पहुंची हैं, वे उस शर्मनाक वातावरण की साजिश में पले-बढ़े हैं, जहां संस्कृत का मतलब भारत नहीं बल्कि कुछ और होता है।
विविधता में एकता बनाए रखने के लिए संस्कृत का बचे रहना बहुत आवश्यक है। संस्कृत एक परम्परा है। जो सारे भारत की अस्मिता और उसके चरित्र की कथा कहती है। आज जब संस्कृत पर संकट के बादल छाए हुए हैं तो संस्कृत से जुडे लोगों को अधिक सावधान हो जाने की जरूरत है। केद्रीय विद्यालयों में संस्कृत के बराबर जर्मन और फें्रच भाषाओं के रखे जाने से संस्कृत के प्रति निश्चित रूप से छात्रों का आकर्षण कम हुआ है। संस्कृत से आम जनता को जोड़कर उन्हें संस्कृत पढ़ने और उसे बचाने के लिए प्रेरित करने का काम हम सबका है। यदि हम अभी नहीं चेते तो संस्कृत के प्रति हमारी वफादारी संदेह के घेरे में चली जाएगी। संस्कृत को आगे बढ़ाने के लिए हमें तैयार होना पड़ेगा, सच्चे मायनों में यही "संस्कृत दिवस" है।
भारत में "श्रावणी" रक्षाबंधन अर्थात श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती रही है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1968 में देश के प्रख्यात भाषाविद सुनीतिकुमार की सिफारिश पर आज के दिन को "संस्कृत दिवस" मनाने के लिए निश्चित कर दिया। संस्कृत दिवस के केन्द्र में संस्कृत की स्थिति की चर्चा और संस्कृत विद्वानों का आदर-सत्कार है। जमाना बदला तो "श्रावणी" का नाम और इसे मनाने का तरीका तथा मनाने वाले भी बदल गए। आज ही के दिन संस्कृत दिवस मनाने के महžव को शायद वे लोग समझते होंगे, जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर संस्कृत के बारे में सोचते होंगे। जो केवल नौकरी या कर्मकांड के रूप में संस्कृत से जुडे हैं, उनके लिए तो संस्कृत दिवस का दिन "मजबूरी" है।
आज के दिन को छोड़कर जो संस्कृत दिवस आगे-पीछे मना रहे हैं और पुरस्कारों का लेन-देन कर रहे हैं, वे जरा पूछे अपने-आप से कि हजारों वर्षो से चली आ रही इस परम्परा को उन्होंने क्यों तोड़ा? संस्कृत को पुरस्कारों का आडंबर नहीं, बल्कि सच्चा समर्पण चाहिए! संस्कृत दिवस अब एक कर्मकांड बन कर रह गया है। आज सच्चे, आधे और झूठे मन से संस्कृत को याद किया जाता है। संस्कृत के इतिहास को दोहराया जाता है और उसे "श्रद्धांजलि" दी जाती है। यह निर्घारित है कि अधिकतर वक्ता इस दिन वही रटी-रटाई बातें कहेंगे, जिन्हें वे बोलते आ रहे हैं और उन बातों को सुनने वाला आज तक कोई नहीं मिला। संस्कृत के पंडित शासन में बैठे मंत्री और विधायकों से छिपकर सरकार को कोसते हुए वही सनातन बात करेंगे कि सरकार संस्कृत के लिए कुछ नहीं कर रही पर हम संस्कृत के लिए बहुत कुछ करना चाह रहे हैं। जरा पूछिए, इन आत्ममुग्ध महापुरूषों से कि सरकार संस्कृत का पक्ष न लेती और सत्ता का आश्रय संस्कृत को प्राप्त न होता तो क्या ये संस्कृत के नाम से पुरस्कार ग्रहण करने वाले संस्कृत को बचा कर अभी तक जिंदा रख सकते थे? संस्कृत ने इन्हें सब कुछ दिया पर ये भी तो संस्कृत को कुछ देना सीखें।
राजस्थान की सरकारों का इतिहास उठाकर देखिए, देश का पहला संस्कृत शिक्षा निदेशालय 1958 में राजस्थान में बना। जगन्नाथ पहाडिया ने 1980 में राजस्थान संस्कृत अकादमी की स्थापना की। भैरोंसिंह शेखावत की सरकार ने 1998 में राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक विधानसभा में पास किया, जिसका परिणाम जयपुर के मदाऊ में स्थित विशाल संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में दिखाई दे रहा है। वसुंधरा राजे सरकार ने 24 वेद विद्यालय खोले। गहलोत सरकार ने राजस्थान में 300 संस्कृत प्राथमिक विद्यालय, संस्कृत शिक्षा के भरतपुर संभाग की स्थापना, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में अरसे बाद नियुक्तियां की हैं। सरकार लाखों रूपए के पुरस्कार बांट रही है।
अब सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठे संस्कृत के चतुर सुजान पंडित भी तो "कुछ" करें। संस्कृत शिक्षा मंत्री बृजकिशोर शर्मा अनेक बार इस बात को दमदार तरीके से संस्कृत के लोगों के बीच कह चुके हैं कि "संस्कृत वाले भी संस्कृत का भला करने के लिए आगे आएं।" भारत माता की संतान जब कभी अपने चमकते इतिहास की ओर देखती है, तो उसे ढेर सारे झंझावातों के बीच जो चीज शुरू से आज तक अपने साथ चली आती दिख रही है, वह है संस्कृत। संस्कृत मात्र भाषा नहीं, संस्कृत तो भारत माता के धर्मनिष्ठ वीर सपूतों से लेकर कंकड़-पत्थरों की अमर गाथा कहती वह सुरीला राग है, जो हिमालय की अपत्यकाओं से उठकर समुद्र के भीतर तक रची-बसी है। भारत की अनेक मान्यताएं भले बदल गई हों, पर यदि आज भी भारत का भारत तžव बचा हुआ है तो उसके केंद्र में संस्कृत है। सारी भारतीय भाषाएं अंग्रेजी तूफान का सामना कर रही हंैं, तो उनके पीछे शक्ति और सामथ्र्य दोनों ही संस्कृत के हैं। जो आधुनिक ज्ञानी यह समझाने में लगे हैं कि संस्कृत अब समाप्ति तक आ पहुंची हैं, वे उस शर्मनाक वातावरण की साजिश में पले-बढ़े हैं, जहां संस्कृत का मतलब भारत नहीं बल्कि कुछ और होता है।
विविधता में एकता बनाए रखने के लिए संस्कृत का बचे रहना बहुत आवश्यक है। संस्कृत एक परम्परा है। जो सारे भारत की अस्मिता और उसके चरित्र की कथा कहती है। आज जब संस्कृत पर संकट के बादल छाए हुए हैं तो संस्कृत से जुडे लोगों को अधिक सावधान हो जाने की जरूरत है। केद्रीय विद्यालयों में संस्कृत के बराबर जर्मन और फें्रच भाषाओं के रखे जाने से संस्कृत के प्रति निश्चित रूप से छात्रों का आकर्षण कम हुआ है। संस्कृत से आम जनता को जोड़कर उन्हें संस्कृत पढ़ने और उसे बचाने के लिए प्रेरित करने का काम हम सबका है। यदि हम अभी नहीं चेते तो संस्कृत के प्रति हमारी वफादारी संदेह के घेरे में चली जाएगी। संस्कृत को आगे बढ़ाने के लिए हमें तैयार होना पड़ेगा, सच्चे मायनों में यही "संस्कृत दिवस" है।
sanskrutm na kevalam bhasa asmakam janana api tasyah rakshanam asmakam, paramam kartabyam
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