पिछले दिनों कोटा के महाराव भीमसिंह अस्पताल में उस समय हडक़ंप मच गया, जब अस्पताल के आईसीयू में दो साल पहले मृत एक मरीज की आत्मा वापस लाने के लिए तांत्रिक टोना-टोटका करने लगे। करीब पौन घंटे तक अस्पताल में टोना-टोटका और तंत्र-मंत्र चलते रहे। जो लोग टोटका करने आए थे, उनमें से अधिकांश अस्पताल के बाहर रुक गए और तीन-चार तांत्रिक स्टील का पीपा, मटके, नींबू, लाल-पीले कपड़े समेत कुछ पूजा सामग्री लेकर आईसीयू में घुस गए। मौके पर सैंकड़ों लोग जमा हो गए। लेकिन पुलिस व अस्पताल प्रबंधन मूकदर्शक बना रहा।
दरअसल दो साल पहले अजमेर जिले की केकड़ी तहसील के सावर गांव निवासी रमेश की एमबीएस अस्पताल में उपचार के दौरान मौत हो गई थी। इसके बाद बुुजुर्गों और तांत्रिकों की सलाह से परिजन मृतक की वार्ड से आत्मा को लेने शनिवार को एमबीएस अस्पताल पहुंचे और वहां टोने-टोटके का खेल शुरू कर दिया। इस दौरान जिस वार्ड में रमेश भर्ती था, वहां तांत्रिक-भोपों ने पूजा की। थोड़ी देर पूजा करने के बाद मृतक के परिजनों के साथ तांत्रिक आईसीयू वार्ड से ज्योत जलाकर बाहर चले गए। इस दौरान वार्ड में भर्ती मरीजों के तीमारदारों के साथ ही मौजूद चिकित्सकों ने ज्योत के जरिए आत्मा को ले जाने का पूरा खेल देखा। इतना ही नहीं, इस धार्मिक कर्मकांड के बाद मृतक के परिजन अस्पताल परिसर में उस जगह क्रॉस का निशान लगा कर भी गए। यह पूरा घटनाक्रम एमबीएस हॉस्पीटल के न्यूरो सर्जरी के आईसीयू में हुआ। अस्पताल कार्मिकों के अलावा सुरक्षा गार्डों में किसी ने भी उन्हें नहीं रोका। जबकि ज्योत लेने या अन्य पूजा सामग्री का प्रयोग करने से वार्ड में भर्ती अन्य मरीजों को इंफेक्शन का खतरा हो सकता था।
मृतक के परिजनों के अनुसार दो साल पहले रमेश की मौत हो गई थी। ऐसे में उसकी आत्मा यहीं ‘छूट’ गई थी। वे उसे विधि-विधान से लेने आए हैं। अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. करनेश गोयल ने कहा कि ‘आईसीयू में जिन लोगों ने टोना-टोटका किया है। उनके साथ कई लोग आए थे। ऐसे में मना करने पर हंगामा व मारपीट की आशंका होती है, इसलिए हमने उन्हें नहीं रोका।’ टोने-टोटकों के विरुद्ध कानून होने के बाद भी ऐसा मामला सामने आना व्यवस्था पर भी सवाल है। यह घटना आज के हिंदुस्तान में हो रही ढेर सारी घटनाओं के बारे में बता रही है। सैंकड़ों लोगों की बंद आंखों की अंधी सोच को प्रदर्शित कर रही है। इस सोच की आध्यात्मिक ऊंचाई इतनी कम है जिस पर बहस करना बहुत कठिन है।
एक सिद्धांत है कि आस्था तर्क नहीं मानती। लेकिन इस सिद्धांत से सहमत होते हुए भी आस्था के कुछ सामाजिक सवाल तो बन ही जाते हैं। जिनका जवाब दिए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। बिना तर्क की आस्था विश्वास को भ्रष्ट कर देती है। यह ऐसे विश्वास को जन्म देती है, जो नीचे की ओर ले जाने वाला होता है। इसी कारण जिस आत्मा को लेने रमेश के परिजन अस्पताल पहुंचे, वह आस्था के साथ ही तर्क और वितर्क का विषय जरूर है। आस्था के साथ तर्क का होना भारतीय चिंतन की सबसे बड़ी खासियत है। यहां तो पदार्थ की सिद्धि के लिए इतने तर्क हुए कि एक पूरा ‘तर्कशास्त्र’ ही बन गया।
भारतीय शास्त्र परंपरा में आत्मा एक चैतन्य निर्मल तत्त्व है। इसका जड शरीर से संयोग जीवन और वियोग ही मृत्यु है। यह आत्मा परमात्मा का अंश है। जैसे जल की कोई भी बूंद समुद्र का ही अंश है। जल की वह बूंद समुद्र को पाना चाहती है। आत्मा भी ऐसे ही अपने अंशी परमात्मा को पाकर पूर्ण होती है। आत्मा को लेकर जितना चिंतन हुआ, उसमें यह तथ्य सभी दार्शनिकों को स्वीकार है कि आत्मा में चेतना है। दसवीं सदी में सुदूर दक्षिण में हुए यामुनाचार्य ने अपने ग्रंथ ‘सिद्धित्रय’ में आत्मा पर गहरा काम किया। वे लिखते हैं कि आत्मा की चेतना से ही शरीर, इंद्रियां, मन, प्राण और बुद्धि काम करते हैं। यह आत्मा कभी न समाप्त होने वाला तत्त्व है। यह शरीर में भिन्न-भिन्न होती है।
आत्मा देह में आने से पहले और देह को छोडऩे के बाद कई शरीरों में भटकती रहती है। गीता में इसका लंबा विवेचन है। पुनर्जन्मवाद का सिद्धांत आत्मा के बार-बार शरीर को छोडऩे और पकडऩे पर ही टिका है। आत्मा के रहने के अलग-अलग ठिकाने हैं। वह देव, पितृ, प्रेत, पिशाच तथा मनुष्य आदि योनियों में घूमती रहती है। इन शरीरों में घूमने का रहस्य आत्मा के शरीर द्वारा किए गए कर्मों पर आधारित है। लेकिन हकीकत में यह आत्मा न तो मरती है और न ही किसी को मारती है। फिर यह विश्वास की आत्मा को नींबू, सिंदूर और ज्योत से लाया जा सकता है, अशास्त्रीय और अधार्मिक है!
श्रीकृष्ण गीता में श्रद्धा के तीन भेद बताते हैं, सात्विक, राजस और तामस। यदि तर्कहीन विश्वास से की गई इस प्रक्रिया को शास्त्रीय मान भी लें तो भी यह तामस के घेरे में आएगी। जो ऊध्र्व और मध्य, दोनों से दूर ले जाकर अधोगति प्रदान करती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रेत और पिशाचों की योनि मनुष्य योनि से हीन है। फिर इनकी पूजा करने वाला या करवाने वाले भी मनुष्यता के धरातल से नीचे उतरे हुए हैं। इसीलिए देव, पितृ और मनुष्य की पूजा करने का विधान श्रेष्ठ है।
तांत्रिकों ने धर्मभीरु लोगों को अपने व्यामोह के जाल में फंसाकर टोने-टोटकों का इस्तेमाल किया है। उनका लोगों को दिवंगत आत्मा के प्रति यह विश्वास दिलवाना कि वे ‘भटक’ रहे हैं, उनकी आमदनी का मार्ग खोलता है। लोगों में अंधा विश्वास जमाकर उन्हें मूल धारा से भटकाकर झाड़-फूंक से जोड़ देते हैं। ये सभी लोग पारलौकिक शक्तियों के भरोसे अवास्तविक लाभ की इच्छा रखते हैं। जो इनका प्रयोग करवाते हैं वे लोग अनिश्चितता, विकल्पहीनता और लालच के शिकार होते हैं। तंत्र विद्या या ऐसे तमाम कर्मकांडों या अंधविश्वासों को आध्यात्मिकता का हिस्सा नहीं माना जा सकता। आध्यात्मिकता में सांसारिक वस्तुओं से दूर हटने पर जोर होता है, जबकि इससे उलट जादू-टोना का पूरा ढांचा भौतिक लक्ष्यों को पाने पर केंद्रित होता है।
तंत्र एक शाश्वत ज्ञान है। तंत्रशास्त्र की एक सुदीर्घ परंपरा है। सर जॉन वुडरफ ने संस्कृत के ग्रंथ ‘महानिर्वाणतंत्र’ का अंग्रेजी अनुवाद करते समय लिखा था कि ‘भारत के पास यदि तंत्रशास्त्र न होता तो फिर यह भारत ही नहीं होता।’ यह 1918 की बात है।
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राजस्थान संस्कृत अकादमी के एक कार्यक्रम में जयपुर में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे |
कोटा की घटना का संबंध पिछले साल के सितंबर में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के दिए उस बयान से भी है, जिसमें राजे ने राजस्थान में ‘तंत्रशास्त्र अध्ययन केंद्र’ खोलने की बात कही थी। राजे का कहना यह था कि लोग तंत्र विद्या की शक्ति से परिचित हों। हालांकि राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के मौजूदा हालात ने उनकी तंत्र विद्या की पढ़ाई शुरू करवाने की इस योजना पर पानी फेर दिया है। अभी तक इस दिशा में कोई काम शुरू नहीं हो पाया है। राजे ने तब यह जिक्र भी किया था कि वे कोच्चि जाकर खुद उस संस्थान की जानकारी इकठ्ठा करेंगी, जो तंत्र विद्या की पढ़ाई कराने वाला भारत का इकलौता संस्थान है। वसुंधरा तंत्र विद्या को जादू-टोना कहे जाने का भी विरोध करती हैं। उनकी राय है कि तंत्र विद्या को टोना-टोटका बताना इसका स्तर नीचे गिराना है। क्योंकि टोना-टोटका और तंत्र विद्या में काफी फर्क है।
शास्त्री कोसलेन्द्रदास
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