Wednesday, July 26, 2017

जामिया मिलिया इस्लामिया में संस्कृत विभाग

जामिया मिलिया इस्लामिया में संस्कृत विभाग खोला गया है। इसके निहितार्थ राजनीति से ऊपर होने चाहिए। भारत के भाषायी स्वरूप में संस्कृत सर्वोच्च है। उसका साहित्य सनातन है। इसी नाते प्रादेशिक भाषाओं में लिखे साहित्य में संस्कृत के स्वर सुनाई देते हैं। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारीसिंह ‘दिनकर’ जैसे हिंदी कवियों की रचनाएं भी संस्कृतनिष्ठ हैं। रामायण, महाभारत तथा पौराणिक आख्यान सारी लोकभाषाओं के साहित्य के स्रोत हैं। यह सोचकर ही जामिया के कुलपति प्रो. तलत अहमद ने जामिया को संस्कृत से जोडऩे की पहल की है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने इस बात को अपनी स्थापना के समय समझ लिया था, जब वह मोहमडन एंग्लो ऑरियंटल कॉलेज के रूप में 1875 ईस्वी में था। कालांतर में इस कॉलेज के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में बन जाने के बाद भी संस्कृत का अध्ययन न केवल जारी रहा बल्कि अनेक संस्कृत विद्वानों का चयन किया गया। पंडित रामस्वरूप शास्त्री अलीगढ़ मुस्लिम विवि में पहले संस्कृत व्याख्याता नियुक्त हुए। यह 1920 की बात है। 
जामिया में संस्कृत विभाग का एक बैनर 
हिंदी का जब विरोध होता है, तो यह शाश्वत सवाल हर बार उठता है कि क्या संस्कृत को हमारी राष्ट्रभाषा होना चाहिए था? इसके पीछे एक तर्क है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। हिंदी किसी प्रदेश विशेष की भाषा नहीं है। बल्कि देश का बड़ा भाग हिंदीभाषी है। हिंदी की बोलियां जरूर अनेक हैं फिर भी हिंदी की खड़ी बोली का स्वरूप लगभग सर्वमान्य है। हिमाचल प्रदेश से लेकर बिहार होते हुए राजस्थान-मध्यप्रदेश तक हिंदी क्षेत्र है। संविधान ने इसी व्यापकता के कारण हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाया था। इससे दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिमी भारत के लोगों को लगा कि हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों को इसका स्वाभाविक लाभ मिलेगा। हिंदी भाषी लोगों की मातृभाषा और राष्ट्रभाषा, दोनों एक है। जबकि अन्य लोगों की भाषा वह नहीं है, अत: उन्हें हिंदी सीखनी पड़ी। इसी विषय पर लोगों में टकराव आया। यह टकराव नहीं होता यदि संस्कृत राष्ट्रभाषा होती, क्योंकि उस समय संस्कृत किसी भी प्रांत की मातृभाषा नहीं थी। इस कारण संस्कृत सबको सीखनी पड़ती और यह भाषाई विवाद पैदा ही नहीं होता। यदि ऐसा संभव हो पाता तो यह इजराइल में हिब्रू भाषा लागू किए जाने जैसा होता। 
याद कीजिए, संविधान सभा में डॉ. भीमराव अंबेडकर और प्रो. नाजिरुद्दीन अहमद जैसे विद्वानों ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा का स्थान दिलवाने का प्रस्ताव रखा था। यह 1949 की बात है। उनका मानना था कि देश को भाषाई एकसूत्र में पिरोने का काम संस्कृत कर सकती है। लेकिन जिस समय यह निर्णय लिया जाना चाहिए था, उस समय नहीं हो पाया। अब यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने की बात की भी जाए तो उसमें पर्याप्त कठिनाइयां हैं। यहां तक की हिंदी क्षेत्र में ही इसका विरोध होगा। हां, हिंदी से इतर क्षेत्र में लोगों को संस्कृत सीखने में आसानी होगी, क्योंकि वहां आम बोलचाल में संस्कृत की प्रचुर शब्दावली है। वैसे शब्दावली तो हिंदी में भी संस्कृत की ही है। 
भारत में चार भाषा परिवार हैं। पहला आर्य भाषा परिवार (इन्डो आर्यन फैमिली), दूसरा द्रविड भाषा परिवार, तीसरा हिमालयी (तिब्बतो) भाषा परिवार और चौथा है आदिवासी (कोली, मुंडारी आदि) भाषा परिवार (ऑस्ट्रिक)। आर्य भाषा परिवार में हिंदी नहीं है। इसमें गुजराती, मराठी, बांग्ला और उडिया जैसी दूसरी भाषाएं हैं। इन भाषाओं और हिंदी में अंतर इतना-सा है कि हिंदी में तद्भव शब्दों का प्रयोग है जबकि द्रविड परिवार की भाषाओं में तत्सम शब्दों का प्रयोग है। यह प्रयोग संस्कृत को इन भाषाओं के निकट लाता है। हिंदी में हम ‘नींद’ कहते हैं पर इनमें ‘निद्रा’ कहा जाता है। 'निद्रा' एक संस्कृत शब्द है, जो प्रादेशिक भाषाओं में यथावत् प्रयुक्त होता है। द्रविड भाषाओं में संस्कृत शब्दों की बात करें तो मळयालम के लगभग 70 प्रतिशत शब्द संस्कृत से हैं। तेलुगू में 60 प्रतिशत संस्कृत शब्द हैं। कन्नड़ व तमिळ में भी अनेक संस्कृत शब्द हैं। पूर्वी भारत की उडिया, असमिया और बांग्ला में संस्कृत शब्दों की भरमार है। राष्ट्रगीत में मात्र क्रियापद में भेद है, बाकि सारे शब्द संस्कृत के हैं। ‘सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्, सस्यश्यामलां मातरम्’ आदि संस्कृत शब्द हैं जबकि इसे बांग्ला में रचा माना जाता है। स्पष्ट है, संस्कृत ऐसा सूत्र है जो देश को भाषायी धरातल पर एकसाथ लाने में समर्थ है। ऐसे में यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रस्तुत करने में कठिनाइयां हैं तो भी इतना हम कर सकते हैं कि संस्कृत को प्रोत्साहित किया जाए। जिससे इसका प्रचलन बढ़े। इससे विभिन्न भाषा-भाषी लोग अपने-आपको एक-दूसरे के निकट पाएंगे। 
संस्कृत को धर्म, संप्रदाय या जाति से जोडऩा भूल है। संस्कृत के विकास में गैरहिन्दुओं का बड़ा योगदान है। 2005 में 7 खण्डों में आचार्य सत्यव्रत शास्त्री का एक ग्रंथ आया था-‘डिस्कवरी ऑफ संस्कृत ट्रेजर्स’। उस ग्रंथ में लंबा विवेचन इसी विषय पर है-‘कंट्रीब्यूशन ऑफ मुस्लिम्स टू संस्कृत’। ‘क्रिश्चियन लिट्रेचर इन संस्कृत’ पर भी इस ग्रंथ में चर्चा है। ईसाइयों ने श्रीमद्भगवद्गीता की तर्ज पर ‘ख्रीस्त गीता’ का प्रणयन किया है। केरल के पीसी देवसिआ ने 33 सर्गों में लंबा संस्कृत महाकाव्य लिखा-‘ख्रीस्तुभागवतम्’। इस महाकाव्य पर 1980 में उन्हें संस्कृत का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। ‘यीशुचरितम्’, ‘यीशुमाहात्म्यम्’ और ‘यीशुसौरभम्’ जैसे अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं। यहां तक की महाभारत के प्रसिद्ध ‘विष्णुसहस्रनामस्तोत्र’ की तरह ‘ख्रीस्तुसहस्रनामस्तोत्र’ भी लिखा गया। ऐसे ही अनेक मुस्लिम संस्कृत विद्वान् हुए हैं। 
पुराने जमाने से मुस्लिमों ने संस्कृत पर लेखनी चलाई। अब्दुल रहीम खानखाना ने ‘खेटकौतुकम्’ व ‘रहीमकाव्यम्’ लिखा। उस दौर में एक नई मणिप्रवाल शैली विकसित हुई, जिसमें आधे श्लोक को उर्दू और आधे को संस्कृत में लिखा जाता था। एक श्लोक सर्वाधिक प्रसिद्ध है-
एकस्मिन् दिवसावसानसमये मैं था गया बाग में/ काचित् तत्र कुरङ्गबालनयना गुल तोड़ती थी खड़ी।
तां दृष्ट्वा नवयौवनां शशिमुखीं मैं मोह में जा फंसा/ तत्सीदामि सदैव मोहजलधौ हा दिल गुजारे शुकर।।
भाषाओं के समूह में एक विदेशी भाषा परिवार है दक्षिण-पूर्व एशिया। दूसरा है सुदूर-पूर्व तथा तीसरा यूरोप। जहां तक दक्षिण-पूर्व एशिया की भाषाएं हैं, उनमें प्रचुर शब्दावली संस्कृत की है। अरसे पहले एक महत्वपूर्ण ग्रंथ आया था-‘संस्कृत वॉकुबलेरी ऑफ साउथ-ईस्ट एशिया’। इससे विदेशी भाषाओं में संस्कृत शब्दों के प्रयोग की स्थिति पता चलती है। हालांकि भारतीय भाषाओं में संस्कृत की शब्दावली पर काम होना अभी बाकी है। हमें आज भी यह पता नहीं है कि तेलुगू, कन्नड या मळयालम या हरियाणवी-पंजाबी-राजस्थानी में कितने शब्द संस्कृत के हैं? लोग अपनी सुविधा से इन भाषाओं में संस्कृत शब्दों के प्रयोग का प्रतिशत घटाते-बढ़ाते रहते हैं। वैज्ञानिक रूप से इनमें कितने शब्द संस्कृत के हैं और कितने देशज, यह काम अभी नहीं हो पाया है। 
आश्चर्य होता है जब हम पाते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया की भाषाओं में संस्कृत शब्द अच्छी तादाद में हैं। मूल उच्चारण में थोड़ा-बहुत अंतर वैसे ही है जैसे हमारे यहां ‘घट’ को ‘घड़ा’ कहने में है। लेकिन विदेशों में इतने सटीक संस्कृत शब्द हैं कि यदि दक्षिण-पूर्व एशिया के शब्दों को देख लिया जाए तो बहुत शब्दों को गढऩे की जरूरत ही नहीं पड़ती। थाई भाषा में दिशावाची दक्षिण-पूर्व को ‘आख्नेय’ कहते हैं। यह ‘आख्नेय’ संस्कृत के ‘आग्नेय’ शब्द से बना है। बैंकाक में 9 विश्वविद्यालय हैं जिनमें से 7 के नाम संस्कृत में और दो राजाओं के नाम पर हैं। एक विश्वविद्यालय का नाम है-धर्मशास्त्र विश्वविद्यालय। इस विश्वविद्यालय में एक बिल्डिंग का नाम है-साला अनेक प्रसंगू यानी अनेक कार्य हेतु शाला (मल्टीपर्पज बिल्डिंग)। लाओ भाषा में ‘वन-वे’ के लिये ‘एकदिशा मार्ग’ शब्द है। ‘वल्र्ड बैंक’ के लिये ‘लोक धनागार’ शब्द है। मलय भाषा में ‘ऐरोप्लेन’ के लिये ‘आकाशयान’ शब्द है।  इंडोनेशिया में हाथी को ‘गजो’ कहा जाता है। फोटो के लिये ‘रूप’ शब्द है। ‘गार्डन’ के लिये ‘उद्यान’ शब्द है। ऐसे हजारों शब्द हैं। 
ऐसा नहीं है कि संस्कृत में लिखा जाना बंद हो गया है। अभी भी संस्कृत में खूब लिखा जा रहा है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माधवश्री हरियानी ने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की जीवनी संस्कृत में ‘यशोऽर्णव:’ नाम से 3 खण्डों में लिखी। स्वतंत्रता संग्राम की अनेक जानकारियां इसमें मिलती हैं। 
संस्कृत के जो हालात है, उसके लिए संस्कृत के लोग जिम्मेदार हैं। उनसे जब कभी बात करो तो वे संस्कृत पर बोलते हुए ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जिसका संस्कृत की मौजूदा स्थिति से कोई संबंध नहीं है। संस्कृत के साथ एक समस्या यह भी है कि उसका धीरे-धीरे वैसा रूप बन रहा है, जैसी नेताओं की जरूरत है। आज संस्कृत के पक्ष और विपक्ष में खड़े होने की राजनीति है। उसके पक्ष और विपक्ष में वोट हैं। राजनेताओं की इसी उदारता का फल है कि लगभग संस्कृत विश्वविद्यालय ‘वेंटीलेटर’ पर हैं। क्या यह कम दुख की बात नहीं कि संस्कृत में गंभीर अध्ययन और स्तरीय शोध के लिए कोई विश्वस्तरीय केंद्र भारत में नहीं है। जहां रहते हुए स्कॉलरशिप पाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध किया जा सके। जो किसी धर्म या राजनैतिक दलों की क्षुद्र लिप्साओं का पूरक न होकर संस्कृत की जरूरतों को पूरा कर पाए। संस्कृत ऐसी गाय है जो नेताओं को दूध की तरह वोट देती है। दूसरी ओर, संस्कृत के विद्वान् इससे धन और प्रतिष्ठा पाते हैं। संस्कृत की फिक्र न नेताओं को है और न ही इसके झंडाधारकों को। ऐसे में यह सुकून है कि जामिया मिलिया इस्लामिया में संस्कृत ने एक कदम आगे बढ़ाया। यदि संस्कृत ऐसे ही बढ़ती और बचती रही तो ही संभव है कि आने वाली पीढिय़ां वेद, उपनिषद्, रामायण-महाभारत तथा गीता को उनकी मूल भाषा में पढ़ सकेंगी। 
-: शास्त्री कोसलेन्द्रदास

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