राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने वाराणसी में ‘संस्कृत पुस्तक मेला’ लगाया। यह संस्कृत पुस्तकों के प्रचार-प्रसार करने का अनूठा आयोजन था। अद्वितीय शिल्प, अनूठी संस्कृति और असाधारण इतिहास के लिए पूरी दुनिया में विख्यात ज्ञान-विज्ञान की नगरी वाराणसी में शब्द और विचारों के विशाल कैनवास पर संस्कृत की किताबों को लेकर ऐसा संगम देश भर में पहली बार हुआ। 9 से 17 सितंबर तक वाराणसी में आयोजित इस पुस्तक मेले में संसार की सबसे पुरानी भाषा के भविष्य को तय करने के लिए अनेक धर्माचार्य, कवि, चिंतक, विचारक, लेखक और प्रबुद्ध हस्तियों ने हिस्सा लिया। उन्होंने संस्कृत को बढ़ाने और बचाने के लिए अपने अनुभवों को साझा किया। इस ज्ञान गंगा में देश भर के विद्वानों की विचार धाराएं इक_ी हुई। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) के हीरक जयंती वर्ष के सिलसिले में आयोजित संस्कृत पुस्तक मेले का शुभारंभ उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने किया। पहले दिन का आकर्षण ‘गांधी-तत्त्व-शतकम्’ नामक संस्कृत पुस्तक रही, जिसका यहां विमोचन हुआ। पुस्तक में संस्कृत के 107 श्लोकों से महात्मा गांधी के संस्कृत और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति उनके प्रेम को उजागर किया गया है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि 1957 में स्थापित एनबीटी ने अब तक 34 भारतीय भाषाओं में पुस्तकों का प्रकाशन किया है, लेकिन संस्कृत उसमें अब तक शामिल नहीं हो पाई है। ट्रस्ट ने संस्कृत को बिसरा-सा रखा था। ट्रस्ट के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने इस कमी पर ध्यान दिया। पहली बार संस्कृत पुस्तक का प्रकाशन ट्रस्ट से शुरू हुआ। यह प्रकाशन किसी धर्मग्रंथ का नहीं बल्कि महात्मा गांधी के अमर संदेशों का संस्कृत में श्लोकबद्ध अनुवाद है। यह सही है कि ट्रस्ट के मौजूदा अध्यक्ष बलदेव भाई संस्कृत के प्रति सचेत हैं इसीलिए उन्हें एनबीटी से संस्कृत पुस्तकों के प्रकाशन की जरूरत महसूस हुई। यह ध्यान देने की बात है कि बलदेव भाई ने एनबीटी का नाम बदलकर ‘राष्ट्रीय पुस्तक न्यास’ रख दिया है। उनका मानना है कि सरकार के किसी भी संस्थान का नाम भारतय भाषा में होना चाहिए।
विश्वनाथ की नगरी वाराणसी के बीच मैदागीन स्थित टाउनहॉल में लगा संस्कृत पुस्तक मेला संस्कृत में लिखी तथा अनूदित पुस्तकों पर केंद्रित था, लेकिन इसमें आपसी भाषायी संवाद के पुल बनाने की पूरी कोशिश ट्रस्ट द्वारा की गई। इसी कारण इसमें लगे 91 स्टॉलों पर संस्कृत के साथ ही हिंदी साहित्य, अन्य भारतीय भाषाओं समेत अंग्रेजी की भी पुस्तकें उपलब्ध थी। देश भर से संस्कृत भाषा साहित्य के प्रकाशक इस मेले में शरीक हुए। मेले को रोचक और संस्कृत के प्रति आम लोगों में रुझान पैदा करने के लिए मेले में हर दिन संस्कृत संगोष्ठियां और बच्चों के लिए कई संस्कृत प्रतियोगिताएं की गई। यहां तक कि संस्कृत पुस्तकों की खरीद पर विक्रेताओं की ओर से 10 प्रतिशत की विशेष छूट भी दी गई, जिससे संस्कृत पुस्तकों की खरीद बढ़ सके।
संस्कृत पुस्तक मेले का उद्घाटन करते हुए राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि संस्कृत सिर्फ एक भाषा नहीं बल्कि हमारी संस्कृति की आत्मा है। यदि संस्कृत को विलुप्त कर दिया जाए तो कोई भी भारतीय भाषा अपना अस्तित्व नहीं बचाए रख सकेगी। बावजूद इसके दुर्भाग्य है कि आजादी के 70 साल बाद भी संस्कृत भाषा को वह मुकाम नहीं मिला, जो उसे अब तक मिलना चाहिए था।
राज्यपाल राम नाईक के इस बयान के पीछे एक सच्चाई है, जिससे संस्कृत जूझ रही है। यह सच्चाई सरकार शर्मनाक है। इसमें देश की आजादी के बाद के 7 दशकों की कहानी है, जिन्होंने संस्कृत को बढ़ाने की बजाय समेटने का अपराध किया है। आखिर क्यों संस्कृत अब तक एनबीटी के ध्यान में नहीं आ पाई? इस यक्ष प्रश्न का समाधान एनबीटी के अध्यक्ष बलदेव भाई ने खुद किया। उन्होंने इस ओर ध्यान दिलाया कि संस्कृति की समझ के बिना कोई संस्कृत का महत्त्व नहीं जान सकता। संस्कृत और संस्कृति, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। भारत राष्ट्र का तात्पर्य सिर्फ भौतिक विकास नहीं है। भारत का मतलब कृषि और ऋषि दोनों से है। हमें कृषि के साथ-साथ ऋषि परंपरा पर ध्यान देना होगा। जब तक हम ऋषि-महर्षियों के अमर वाक्य नहीं जानेंगे तब तक हम उस विकास को प्राप्त नहीं कर पाएंगे, जिसके हमें आज सर्वाधिक जरूरत है। इसीलिए एनबीटी ने संस्कृत पुस्तक मेले के माध्यम से परंपरा के प्रति लोगों को चेतानी की कोशिश की है। उन्होंने यह भी बताया कि एनबीटी से संस्कृत ग्रंथों के प्रकाशन के लिए ट्रस्ट ने एक राष्ट्रीय संस्कृत सलाहकार समिति का भी पहली बार गठन किया है। इसमें ज्ञानपीठ पुरस्कृत आचार्य सत्यव्रत शास्त्री, प्रो. रमेश कुमार पांडेय, प्रो. पीयूषकांत दीक्षित, प्रो. श्रीनिवास वरखेडी और डॉ. के. श्रीनिवास राव समेत अनेक विद्वानों को शामिल किया गया है। इस समिति की पहली बैठक भी पुस्तक मेले के दौरान वाराणसी में 10 सितंबर को हुई।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से न्याय शास्त्र में पीएचडी कर रहे शोधार्थी लक्ष्मी अभिनव के लिए यह पुस्तक मेला अद्भुत अनुभव जैसा है। एक स्टॉल पर पुस्तक खरीदते हुए उनका कहना है कि वे ‘न्याय मीमांसा’ नामक दुर्लभ पुस्तक की खोज में परेशान थे। यह पुस्तक उन्हें यहां मिली है। जयपुर से इस मेले में शामिल हुए एक संस्कृत पुस्तक विक्रेता विनोद नाटाणी का कहना है कि ‘इस तरह के आयोजन से संस्कृत बाजारवाद में खरी उतर रही है। संस्कृत की पुस्तकों का कारोबार बेहतर चल रहा है। संस्कृत की पुस्तकों का हाथों हाथ बिक जाना मेरे लिए ठीक व्यापारिक लाभ है।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में हुए इस आयोजन ने सरकार के उस प्रयास को भी गति दी है, जिसमें सरकार भारतीय परंपरा और संस्कृत साहित्य के फैलाव पर गहरा ध्यान दे रही है।
- शास्त्री कोसलेन्द्रदास -
(असिस्टेंट प्रोफेसर-राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर)
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